Annie Besant : महिला अधिकारों के लिए उठाई थी आवाज़

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ज्ञान / विज्ञान। देश दुनिया के इतिहास में आज का दिन खास महत्व रखता है। आज यानी 20 सितंबर के दिन कुछ ऐसी कई घटनाएं हुई थी जो आपके लिए जानना बेहद जरुरी है। दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश के तिसरे शासक फिरोज शाह तुगलक का आज ही के दिन साल 1388 में दुनिया को निधन हुआ था। बता दें कि फिरोज शाह ने 37 साल दिल्ली सल्तनत में राज किया।

उसने देशभर में 300 नए नगरों की स्थापना कराई। उसे कट्टर मुस्लिम शासक कहा गया, जिसने इस्लाम स्वीकार न करने वालों पर जजिया कर लगवाया था। फिरोजशाह ने हिंदुस्तान के कई हिस्सों में राज किया। उसके शासनकाल में दिल्ली में चांदी के सिक्के भी चलाए गए। फिरोजशाह तुगलक ने साल 1360 में उड़ीसा पर हमला कर दिया. वहां के शासक भानुदेव तृतीय थे, जिन्हें हराकर उसने जगन्नाथपुरी मंदिर को ध्वस्त कि‍या था।

एनी बेसेंट ने भारत की आजादी में निभाई अहम भूमिका

एनी बेसेंट कहने को भारतीय मूल की नहीं थी लेकिन भारत में रहकर उनके द्वारा किए गए काम और बड़े-बड़े योगदान को देखकर कभी ये लगा ही नहीं कि उनका संबंध किसी और देश से है। एनी बेसेंट की गिनती उन महिलाओं में की जाती हैं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक सक्रिय भूमिका निभाई थी। उन्होंने भारत में रहकर बाल विवाह, विधवा विवाह और जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने की दिशा में काम किया था। एनी बेसेंट एक समाज सुधारक, महिला कार्यकर्ता, सुप्रसिद्ध लेखिका, थियोसोफिस्ट और राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष और एक प्रभावी प्रवक्ता थी। महिला अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करने वाली एनी बेसेंट ने आज ही के दिन साल 1933 में दुनिया को अलविदा कहा था।

आज ही के दिन जन्मे थे श्रीराम शर्मा आचार्यजी

आध्यात्मिक गुरु पंडित श्रीराम शर्मा आचार्यजी का जन्मदिन यूं तो हर वर्ष वसंत पंचमी को मनाया जाता है। लेकिन उनका वास्तविक जन्मदिन 20 सितंबर को होता है। उत्तर प्रदेश स्थित आगरा शहर के नजदीक आंवलखेड़ा में साल 1911 में इनका जन्म हुआ था। श्रीराम शर्मा ने मात्र 12 साल की उम्र में अध्यात्म की राह पकड़ ली थी। इस छोटी उम्र में वसंत पंचमी पर अपने गुरु स्वामी सर्वेस्वरानंदजी से प्रभावित होकर साधना पथ पर अग्रसर हुए। तबसे इन्होंने इस तिथि को अपना आध्यात्मिक जन्मदिन माना और जीवनभर वसंत पंचमी को अपना जन्मदिन मनाते रहे। 18 साल की उम्र में वे गांधी जी से प्रभावित हुए और स्वतंत्रता सेनानी बनने की सोच ली घरवालों के प्रबल विरोध के बावजूद वे कई स्वंत्रता आन्दोलन में शामिल हुए । क्योंकि ये अपनी धुन में मतवाले होकर संग्राम में शामिल होते थे इसलिए इनके साथी इन्हे ‘मत्त’ जी कहने लगे।