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संवेदनाएं जब चीत्कार बन जायें तो क्या लिखूं...?

Shikha Awasthi 15-05-2021 16:21:58 13 Total visiter


 यह श्मशान घाट पर बैठे किसी कवि की कल्पना नहीं, सामने जलती चिताओं की सच्चाई है कि इस शहर में कुछ बड़ा अपशकुन हो गया है। आओ सब मिलकर अपने शहर को बचा लें...!

-श्मशान घाट पर लाश जलाने के लिए जब सौदा होने लगे और घूस देकर अन्तिम संस्कार की क्रियाएं पूरी की जाने लगें तो कुछ कहा जा सकता है क्या...?

- कुछ लोग संवेदनशून्य हो गये हैं इसलिए कि वे कुछ कर नहीं सकते और कुछ की संवेदनाएं अस्पतालों से लेकर श्मशान घाटों तक चीत्कार बन गयी हैं। ऐसे में कुछ  कह सकते हैं क्या...?

- अस्पतालों के गेट पर जब नोटिस चिपका दी जाए कि आपके अपनों को सांसें चलाने के लिए मात्र कुछ ही घंटों की ऑक्सीजन बची है। ऑक्सीजन खत्म होने से पहले आप अपने मरीज की सांसे थमने से रोक सकते हों तो रोक लें। इसे कहीं और ले जाइये हमारे पास ऑक्सीजन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो पा रही है और अस्पताल प्रशासन मजबूर होकर गेट बंद कर दे तो इसे पूरे सिस्टम की लाचारी नहीं तो और क्या कहेंगे...?

- कानपुर के जिला जज के लिए जब नारायण जैसे अस्पतालों के गेट बन्द कर दिये जाएं और सीएमओ को अस्पताल के खिलाफ एफआईआर करानी पड़ जाए तो यह सिस्टम का फेलियर नहीं तो और क्या है...?

- जब एक मजबूत राष्ट्र का शक्तिशाली रहा सेनाध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री को किसी कोरोना मरीज के इलाज के लिए वहां के डीएम को ट्वीट करके मिन्नतें करनी पड़ जायें और सारा देश जान जाये कि मंत्री जी कितने बेबस और असहाय हैं तो आप क्या कहेंगे कि स्थितियां सामान्य हैं...?

- जब उत्तर प्रदेश के एक काबीना मंत्री को प्रशासनिक अधिकारियों को चिट्ठी लिखकर हालात बयां किये जाएं और प्रकाशित करने के लिए उसे अखबार वालों को लीक कर देनी पड़ जाए कि देखो जनता, देख लो। राज्य की प्रशासनिक मशीनरी कैसी है और हम उसके आगे कितने लाचार हैं कि एक अदद एम्बुलेंस भी अपने विधान सभा क्षेत्र के एक लेखक, साहित्यकार और लखनऊ की धरोहर समझे जाने वाले की उखड़ती सांसों को बचाने के लिए नहीं उपलब्ध करा पा रहे हैं तो क्या इसे सिस्टम का नाकारापन नहीं माना जाएगा...?

- जब देश में कोरोना मरीजों की वृद्धि दर 12 दिन में दो गुनी हो और उत्तर प्रदेश में यह तुलनात्मक आंकड़ा महज आठ दिन में ही पार हो जाए तो क्या यह न कहा जाए कि यूपी में सब ठीक तो नहीं चल रहा है।

- सिस्टम से संवेदनाओं की चिन्गारियां अगर पिछले एक साल से निकल रही होतीं तो शायद हालात इस तरह बदतर नहीं होते। लेकिन यहां तो सिस्टम से जुड़ा हर जिम्मेदार शख्स अपनी कमीज को दूसरे से अधिक उजली दिखाने में ही लगा रहा। व्यवस्थाओं में हो गये बड़े-बड़े छेदों को कितना भरा गया, जलती हुई चिताओं में न जाने इसकी कितनी ही कहानियां भस्म हो गयीं। लेकिन सवाल उठे हैं और उठते रहेंगे और सिस्टम से जुड़े लोगों को उनके जवाब आज नहीं तो कल देने ही होंगे। टंकारों की आवाज के साथ चलते तीरों की तरह सवालों से सवालों को टकराकर या किसी हद तक उन्हें काटकर जवाब नहीं पूरा हो जाता है और जब सवालों को सवालों से टकराकर या काटकर व्यवस्था परिहास उड़ाती है तो हालात ऐसे ही उत्पन्न हो जाते हैं और तब चिताओं की रोशनी ढकने के लिए श्मशान घाट पर टीनों का सहारा लेना पड़ता है।

- मौतें जब रोज-रोज अखबारों की हेडलाइंस और टीवी चैनलों की बहसों में महज एक आंकड़़े से ज्यादा कुछ न हों तो किन टिप्पणियों की जरूरत होती है और किनके लिए टिप्पणियों की जरूरत होती है...?

- अविश्वास से भयावह और कुछ नहीं होता। अविश्वास से भय उपजता है। इस भय को उपजने से रोकने के लिए ‘आपने’ क्या किया! क्या महामारी बढऩे के समय से ही यह बयान नहीं आना चाहिए था कि हम अपने राज्य में कोरोना से एक भी व्यक्ति की जान नहीं जान देंगे, भले ही सरकारी खजाने से निजी क्षेत्र के अस्पतालों का पूरा खर्च देना पड़े...? और... निजी अस्पताओं को क्यों नहीं कसा गया कि लूट मचायी तो हश्र क्या होगा...? भामाशाहों की दौलतें और सुविधाएं राज्य की अमानत होती हैं जो आपातकाल में जरूरतमंदों के काम आती हैं... लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ‘आपके’ और भले लोगों के बीच अविश्वास की दूरियां इतनी अधिक हैं कि इन्हें पाटा जाना मुमकिन नहीं लगता...

- श्मशान घाटों से उठती कोरोना मरीजों के बदनों की सड़ान्ध दरअसल उनकी नहीं, सिस्टम की खामियों की सड़ान्ध है जिसने भय की खाइयों को और चौड़ा कर दिया है... यह सवाल हम अपने पाठकों पर छोड़ते हैं।

अंत में शहाब जाफरी का एक शेर और शेष बातें फिर...

तू इधर-उधर की न बात कर यह बता कि काफिला क्यूं लुटा

मुझे रहज़नों से गिला नहीं तिरी रहबरी का सवाल है

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