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सच को ढकेंगे तो दुर्गंन्ध और फैलेगी

pooja 14-05-2021 19:10:23 19 Total visiter


लखनऊ: हम कोई एजेंडा नहीं चलाते हैं. हम अपने दर्शकों पर कोई फैसला भी नहीं थोपते. हम सच दिखाते हैं. हम सच बताते हैं. झूठ की चाशनी से निकली गुलेलों से हम कंकड़ नहीं फेंकते. हम तो बस साफ बात करते हैं. अब अगर अधजली लाशें गंगा में उतराती हुई दिखती हैं तो क्यों न साफ बात होनी चाहिए. जरा सोचिये उन पर क्या बीती होगी जो अपनों की अधजली लाशें बहाकर चले गये. क्या लाश बनने से पहले ये जीवित लोग इतने अभागे थे कि कपोल क्रिया के लिए उनकी लाश को जलने भर की लकड़ी भी नहीं मिल पायी? सोचिये कितने अभागे थे वो? क्या इस पर सवाल नहीं उठने चाहिए? 

कहा जाता है कि महामारी को सामूहिक इच्छा से ही परास्त किया जा सकता है. लेकिन आपने लोगों के बीच इसके लिए क्या किया, इससे ज्यादा जरूरी यह हो जाता है कि सच को जबरन ढका न जाए. लाशों को ढकने से दुर्गन्ध नहीं रोकी जा सकती. लाशों पर जितनी पर्देदारी होगी, दुर्गन्ध उतनी ही ज्यादा फैलेगी?
पिछले दिनों लखनऊ में कोविड अस्पतालों के अपने दौरे के समय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने एक बड़ी अहम बात कही थी रक्षामंत्री ने कहा था कि महामारी से निपटने में यदि कहीं कोई चूक हो जाती है तो आलोचना करने के बजाय सुझाव दिये जाने चाहिए. लेकिन सवाल यह उठता है कि महामारी से निपटने के मामले में क्या किसी स्तर से यह स्वीकारा भी गया कि कहीं कोई चूक भी हुई है. जब सोच व्यक्तिवादी बन जाये कि जो हम कहें वही सही. बाकी सब गलत. तो किस चूक की बात की जा सकती है? जब मुखिया की आँखों को पढ़ लेने के बाद चारों तरफ से घेरे हुए लोग उन्हें वही दिखा रहे है. जो देखना उन्हें पसन्द है. तो इसे क्या कहा जाएगा? 

राज्य के लोगों में विश्वाश तभी भरा जा सकता है. जब उन्हें इस बात की तसल्ली हो जाए कि मुखिया उन्हें भूला नही है. बल्कि उनके साथ खड़ा है. लेकिन जब सवाल इसको लेकर उठने लगे कि समय से इलाज नही मिलने के कारण तमाम लोगों की सांसे उखड़ गयी तो आप इस सच्चाई पर कैसे पर्दादारी करेंगे. शरीर के पोर-पोर से रिसते दर्द को उनके बेहतर और कौन बता सकता है. जिन्होंने अपनों को असमय महज इसलिए खो दिया कि राज्य को जो मदद करनी चाहिए वह नहीं मिली?

आकड़ो की बाजीगरी क्या होती है. इससे पहले आपको यह बताना जरुरी है कि अदालते तथ्यों के आधार पर फैसले सुनाया करती हैं और आदेश देती हैं. ग्यारह मई को मेरठ के मेडिकल कालेज में आक्सीजन की कमी से 20 मरीजों की मौत हो जाती है. इसको लेकर मेरठ के डीएम की रिपोर्ट को कोर्ट नकार देता है. इस पर मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल डॉ ज्ञानेंद्र कुमार कोर्ट को बताते हैं कि सिर्फ तीन मरीजों की ही कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट थी इसलिए सभी मौतों संक्रमण की वजह से हुई नही मानना चाहिए. जज नाराजगी जताते हुए कहते हैं हम यह जवाब स्वीकार नही कर सकते. इन मामलों में ट्रूनेट टेस्ट कराया जा सकता था जो आरटी पीसीआर से काफी जल्दी नतीजे देता है. इस पर डाक्टर ज्ञानेंद्र कहते हैं कि मेरठ मेडिकल कालेज में ट्रूनेट मशीन नहीं है. इस पर कोर्ट ने जो कहा वह गौर करने लायक है. कोर्ट ने कहा कि सरकार का तो दावा है कि सभी सरकारी अस्पतालों में मशीनें उपलब्ध करा दी गयी हैं. और इसके बाद उस तिथि की सुनवाई समाप्त हो गयी. लेकिन सवाल यह उठता है कि राज्य को मेडिकल कोलेजों में मशीनों की अनुपलब्धता है तो क्या इसीलिये डॉक्टर अपने हिसाब से कोरोना संक्रमितों के आंकड़े जारी करते हैं. संक्रमितों की सही संख्या कितनी मानी जाए यह सवाल मैं अपने दर्शकों पर छोड़ता हूं।
 

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