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ये कौन लिखता है प्रेस ब्रीफिंग की स्क्रिप्ट ?

pooja 18-05-2021 19:16:06 21 Total visiter


बात बड़ी और महत्वपूर्ण है. इसलिए अपने दर्शकों से साझा करना और भी जरुरी हो जाता है. आज उत्तरप्रदेश सरकार का एक बयान आया है. बयान सरकार की प्रेस ब्रीफिंग से सीधे जुड़ा है. शायद इस प्रदेश के करोड़ों लोगों को अभी तक यह पता न हो इसलिए सरकार ने यह बताना जरुरी समझा है. अब जरा बयान पर गौर करें तो स्थिति काफी हद तक खुद ब खुद स्पष्ट हो जाएगी. बयान कुछ इस प्रकार है, आशंका थी कि अप्रैल माह में प्रतिदिन संक्रमण के एक लाख केस आयेंगे लेकिन शासन प्रशासन और जनता के सहयोग से ये आशंका निर्मूल सिद्ध हुई.

अब यह स्क्रिप्ट तैयार करने वालों से कोई यह पूछे कि 40 हजार के लगभग अधिकतम केस आने पर आपकी सारी सरकारी मशीनरी गड्डमड्ड होती नजर आ रही थी. अस्पतालों में बेड कम पड़ गये. लोग ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ रहें थे. सरकार के कामकाज के तरीके को लेकर अदालतों में किरकिरी हो रही थी. तैयारियां नाकाफी साबित हो रही थी. ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए घंटो लाइन में लगने के बावजूद लोग निराश हो रहे थे. अपनों को बचाने के लिए लोग रो रहे थे. बिलख रहे थें. अस्पतालों में डॉक्टरों के पैर पकड़कर गिड़गिड़ा रहे थे. जनता का कोपभाजन बनने से बचने के लिए सरकार के मंत्री विधायक और सांसद अपनी बेबसी सरकार को लिखी गई चिट्ठीयों को सार्वजनिक करके जता रहें थे. कभी सोचा है कि अदालतों ने सरकार के खिलाफ क्या-क्या टिप्पणियां की हैं। जिस दिन यह बयान दिया जा रहा था उस दिन अदालत कह रही थी कि गांवों और कस्बों में स्वास्थ सुविधाएं राम भरोसे हैं।

अस्पतालों को छोडिये. हालत यह थी की श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों में जगह कम पड़ गयी थी. लाशें जलाने के लिए जब लकडियां कम पड़ गयीं तो अधजली लाशें गंगा में उतराती दिखीं.

अब आप यह बयान दिलवाकर क्या लोगों के दिलों को सुकून देना चाहते हैं या उनके जख्मों को और ताजा करना चाहते हैं जिनकी उम्मीदों पर सरकार खरी नहीं उतरी. वहीं मंजर क्यों आंखों के सामने लाना चाहते हैं आप? क्या आपको नही पता कि श्मशान घाटों पर समझौते नही किये जाते. न लकड़ी से। न महापात्र से. वे सिर्फ शमशान घाट होते हैं. मुर्दों को फूंकने के लिए कोई हील-हुज्जत भी नही की जाती.

लाशें बोलती नहीं. इसीलिए तो लाशों को जलाने और दफनाने का इन्तजार नहीं किया जाता और सोचिये जिन लाशों को जलाने के लिए अगली सुबह तक नम्बर लगाना पड़ जाए तो दिल पर क्या बीती होगी. ऐसे में मन में कितनी गाठें पड़ती हैं. सबके सब पीड़ादायक.और अभी तो न जाने कितनों के घरों में तेरहवीं की यादें भी नहीं मिट पायी हैं.

सोचिये, 40 हजार मामलों में मौत का यह हाल था. संक्रमितों का आंकड़ा एक लाख होता तो शहर दर शहर क्या हालात होते? लकीरें काम से बड़ी होती हैं, बयानों से नही. ईश्वर करे तीसरी लहर किसी के घर पर मौत बनकर न आये....आज की साफ बात में बस इतना ही फिर किसी दिन किसी और मुद्दे पर मिलेंगे. तब तक के लिए नमस्कार.

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