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शिक्षा मंत्री के भाई को हटा पाना बेहद मुश्किल 

pooja 25-05-2021 19:32:05 10 Total visiter


उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री सतीश चन्द्र द्विवेदी के भाई डा. अरुण द्विवेदी की सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में की गयी एसोसिएट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति से उनको हटा पाना उतना आसान नहीं है जितना विपक्ष सोच रहा है या जिस तरीके से बयानबाजी हो रही है।

अब मैं बताता हूं कि ऐसा क्यों है?
सबसे बड़ी बात तो यह है कि उस पद के लिए साक्षात्कार देने वालों में से एक भी अभ्यर्थी सामने नहीं आया है जो यह कहता कि वह भी अल्प आय वर्ग का था और उसकी एकेडमिक व अन्य योग्यताएं डा. द्विवेदी से बेहतर थीं। इसके बावजूद उसे नजरअंदाज किया गया और अपने पक्ष में वह साक्ष्य राजभवन के समक्ष प्रस्तुत करता। ऐसा अभी तक तो बिल्कुल भी नहीं हुआ है और उधर डा. अरुण द्विवेदी ने अपनी ज्वाइनिंग भी दे दी है।

दूसरी बात यह है कि आरटीआई ऐक्टिविस्ट नूतन ठाकुर ने भले ही उत्तर प्रदेश की गवर्नर और राज्य के विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति आनंदी बेन पटेल को पत्र लिखा हो लेकिन जहां तक विधिक रूप से आगे कार्रवाई की बात होगी तो सबसे पहले यही देखा जाएगा कि क्या पत्र लिखने वाला कोई पीडि़त पक्ष है। चूंकि नूतन ठाकुर पीडि़त पक्ष नहीं हैं इसलिए राजभवन उनके पत्र का संज्ञान क्यों लेगा?

तीसरी बात यह है कि अगर मामले की जांच होती है तो जांच में सबसे पहले यह देखा जाएगा कि संबंधित रिक्त पद पर आवेदन के लिए जो अंतिम तिथि थी, उस तिथि तक डा. अरुण द्विवेदी अल्प आय वर्ग के तहत आते थे या नहीं। इस प्रकार जो उन्होंने आय प्रमाणपत्र संलग्न किया है। वह उस तिथि तक सही था या नहीं। यदि आवेदन करने के एक साल बाद साक्षात्कार होता है तो साक्षात्कार वाले दिन का ताजा अल्प आय वर्ग का प्रमाणपत्र नहीं मांगा जा सकता है। अब जबकि डीएम और एसडीएम खुद बयान दे रहे हैं कि डा. अरुण द्विवेदी का अल्प आय वर्ग का प्रमाणपत्र सही है। तो फिर इसके बाद किसके स्पष्टीकरण की आवश्यकता रह जाती है। भले ही लेखपाल कहे कि प्रमाणपत्र में उसके दस्तखत नहीं हैं लेकिन जब उस परगना का परगनाधिकारी यानी एसडीएम कह रहा हो कि प्रमाणपत्र सही है तो किसकी बात मानी जाएगी?

मेरी खुद सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र दुबे से फोन पर वार्ता हुई। इस वार्ता में मैंने उनसे पूछा कि जैसा कि आज के कुछ समाचार पत्रों में छपा है कि डा. अरुण द्विवेदी से नया अल्प आय प्रमाणपत्र मांगा गया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। उनसे मूल प्रमाणपत्र मांगा गया है जिससे यह जांच कराई जा सके कि वह सही है या नहीं। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने स्पष्ट किया कि जो आवेदन देने की अंतिम तिथि को योग्यता थी, वही मानी जाएगी। उन्होंने स्थिति को और स्पष्ट करते हुए कहा कि मान लिया कोई अभ्यर्थी आवेदन के समय पीएचडी नहीं होता है और साक्षात्कार के समय तक वह पीएचडी पूरी कर लेता है तो चूंकि आवेदन करने के समय वह पीएचडी नहीं था इसलिए उसकी योग्यता वही मानी जाएगी।
इस प्रकार अब दो ही सूरतों में डा. अरुण द्विवेदी की नियुक्ति रद्द हो सकती है। एक तो उनका अल्प आय वर्ग का प्रमाणपत्र गलत पाया जाए और दूसरा यह कि यदि कोई अभ्यर्थी उनकी नियुक्ति को चुनौती देते हुए यह सिद्ध कर दे कि डा. अरुण द्विवेदी से बेहतर योग्यता होने के बावजूद उसे नजरअंदाज किया गया जो कि आज की तिथि में बेहद मुश्किल लग रहा है।

मैंने पूरी स्थितियां आपके सामने रख दी हैं। अब आप खुद ही फैसला करें कि मामले में क्या होगा? आज की साफ बात में बस इतना ही। फिर किसी और दिन किसी और मुद्दे के साथ हम आपसे फिर मिलेंगे। तब तक के लिए नमस्कार!

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