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जातें-जातें ब्राह्मण कार्ड खेल गए शिक्षा मंत्री के भाई

pooja 27-05-2021 18:08:31 14 Total visiter


२१ मई को ज्वाइनिंग और 26 मई को इस्तीफा। यानी मामले पर चारों तरफ से उंगलियां उठने और बड़े भाई की नियुक्ति में संलिप्तता के तमाम आरोपों को लेकर हो रही किरकिरी के छठे दिन इस्तीफा और उस पर भी तुर्रा यह कि क्या मंत्री का भाई होना अपराध है और क्या गरीब ब्राह्मण होना अभिशाप है? आखिर यह कहकर बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री के छोटे भाई डा. अरुण द्विवेदी क्या साबित करना चाहते हैं। क्या उन्हें यह बताने की जरूरत है कि उत्तर प्रदेश की पूरी शिक्षा व्यवस्था से जुड़े दोनों मंत्री ब्राह्मण ही हैं और किसी हद तक राज्य मंत्रिमंडल में सामंजस्य बिठाने के लिए एक तरफ जहां पिछड़े वर्ग से एक उपमुख्यमंत्री को लिया गया वहीं उच्च वर्ग में ब्राह्मण कोटे से एक उपमुख्यमंत्री भी बनाया गया। काश, विद्वान डा. अरुण द्विवेदी प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलने से पहले इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार कर लेते कि वह क्या बोलने जा रहे हैं। अब रही बात मंत्री के भाई होने की तो किसी का भी भाई होना कोई अभिशाप नहीं बल्कि गौरव की बात होती है अगर चीजों में बगैर किसी राग-द्वेष के पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता बरती जाए चाहे वह नियुक्ति ही क्यों न हो?

जहां तक बात भाई की प्रतिष्ठा को लेकर इस्तीफा देने की है, तो यह इस्तीफा दूसरे-तीसरे दिन भी दिया जा सकता था तो फिर इस्तीफा देने में इतना विलंब क्यों? क्योंकि भाई पर विपक्षी दलों की उंगलियां तो दूसरे दिन से ही उठनी शुरू हो गयी थीं। क्या तब भाई की प्रतिष्ठा पर आ रही आंच को नहीं महसूस किया गया? अब तो सवाल यह उठने लगा है कि अगर दामन पूरी तरह से पाक-साफ था। अल्प आर्य वर्ग का प्रमाणपत्र पूरी छानबीन के बाद बना था। चयनकर्ताओं ने बिना किसी राग-द्वेष और प्रभाव में आये बगैर चयन किया तो क्यों नहीं राजभवन या विश्वविद्यालय के स्तर पर एक उच्च स्तरीय स्वतंत्र कमेटी का गठन कर जल्दी से जल्दी जांच की असलियत को सबके सामने रख दिया गया?

न ब्राह्मण होना अभिशाप है और न मंत्री का भाई होना लेकिन जब यह बात सामने आ जाय कि जिस दिन आवेदन की अंतिम तिथि थी उसी दिन अल्प आय वर्ग का प्रमाणपत्र भी बना, तो क्या इसे महज एक संयोग मान लिया जाए या फिर यह किसी शंका को जन्म देता है। इससे पहले यह बात भी चर्चा में आयी थी कि सम्बन्धित लेखपाल ने अपने दस्तखत होने से ही इंकार कर दिया है। तो ये सारी चीजें आखिर क्या इशारा करती हैं। बेहतर होता कि निष्पक्ष और कड़ी जांच के बाद जब चीजें पाक साफ हो जातीं। खास तौर पर जांच रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख हो जाता कि किसी भी स्तर पर जोर दबाव या सिफारिश के आधार पर चयन न होकर पूरी निष्पक्षता और पारदर्शिता के आधार पर चयन किया गया है और तब ताल ठोंककर डा. अरुण द्विवेदी अपने शिक्षामंत्री भाई के सम्मान की बात कहकर इस्तीफा देते तो बात ही कुछ और होती। अब जबकि बगैर जांच के ही अरुण द्विवेदी का इस्तीफा हो गया है तो क्या पूरी घटना का पटाक्षेप हो जाएगा। विपक्ष चुप बैठ जाएगा जबकि आज ही आम आदमी पार्टी के प्रदेश प्रभारी ने अपने बयान में तमाम सवाल उठाये हैं।

- एक सवाल यह भी उठता है कि डा. अरुण द्विवेदी ने सिर्फ दो मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस की और अपनी बात कहकर प्रेस कॉन्फ्रेंस से उठकर चले गये। आखिर वह वहां मौजूद पत्रकारों के सवालों का जवाब देने के लिए क्यों नहीं तैयार थे? क्या केवल यह कहने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलायी गयी थी कि क्या मंत्री का भाई होना अपराध है या फिर ब्राह्मण होना अभिशाप है या फिर सेवारत युवती से विवाह का प्रस्ताव आया तो विवाह करना अपराध हो गया। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है लेकिन पूरे मामले की जांच का सामना करने से पहले ही मैदान छोड़ देना आखिर कुछ तो इशारा करता ही है।
अब इसका फैसला आप करें। आज की साफ बात में बस इतना ही। फिर किसी और दिन किसी और मुद्दे के साथ फिर मिलेंगे। तब तक के लिए नमस्कार।

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