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योगी सरकार की नाकामियों को नहीं भुना पाया विपक्ष

Shikha Awasthi 05-06-2021 19:25:41 10 Total visiter


हम कोई एजेंडा नहीं चलाते। हम साफ़ बात करते हैं। चाहे वह पक्ष हो चाहे विपक्ष। हमने शुक्रवार को ही आपको बता दिया था कि उत्तर-प्रदेश के हालात को देखते हुए फिलहाल योगी आदित्यनाथ ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे। उसके बाद देश भर के न्यूज़ चैनलों ने इसी आशय की खबरें, ट्वीट और डिबेट्स शुरू कर दी। सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार में क्या चल रहा है और आगे की क्या संभावनाएं हैं। इस पर शुक्रवार को हुई साफ़ बात के बाद आज हम नज़र डालते हैं उत्तर-प्रदेश के विपक्षी खेमे पर और आपको बताते हैं कि यूपी में विपक्ष की क्या स्थिति है।

विपक्ष को सत्ता की चाह होती है और इसके लिए वह सरकार के जनप्रतिनिधियों से ज्यादा मेहनत करके और लोगों के बीच घूम-घूमकर न केवल सरकार के कामकाज की कमियां गिनाता रहता है बल्कि उन्हें यह भरोसा दिलाने में लगा रहता है कि अगली बार उसकी सरकार बनाने के लिए आगे आयें और उसकी सरकार इस निकम्मी और गैर ज़िम्मेदार सरकार से बेहतर होगी। विपक्ष शहर-शहर और गांव-गांव जाकर लोगों के बीच सरकार की नाकामियों को गिनाता है और उसके पीछे एक ही उद्देश्य होता है कि अगली बार चुनाव में उसे ही बहुमत मिले।

इस सच्चाई से कोई मुंह मोड़ नहीं सकता कि उत्तर-प्रदेश में कम से कम पिछला डेढ़ साल सरकार की नाकामियों से भरा पड़ा है। न अस्पतालों की सुविधा, न दवाई की सुविधा और न ऑक्सीजन की आपूर्ति। इससे शर्मनाक आदमी की जिंदगी में और क्या होगा कि शव जलाने के लिए श्मशान घाट पर जहग कम पड़ जाए और लकडियां ख़त्म हो जाएं। और बेशर्म प्रशासन अपने गैर जिम्मेदाराना रवैये को छुपाने के लिए श्मशान घाट पर टीन की दीवार खड़ी कर दे।

आपको एक बात और बता दूं जिस पर शायद आपका ध्यान ही आज तक नहीं गया होगा। मैंने तो आज तक किसी अस्पताल के पास शमशान घाट का बोर्ड लगा नहीं देखा जो ये रास्ता बता रहा हो कि आपके परिवारीजन मरीज की मौत हो जाए तो घबराइये नहीं। हम आपको श्मशान घाट का रास्ता भी बताए दे रहें हैं लेकिन इसी लखनऊ में एक नए कोविड अस्पताल के पास शमशान घाट का रास्ता बताने वाला बोर्ड भी लगा दिया गया।

लेकिन सवाल उठता है कि ऐसे दारुण दुःख के समय विपक्षी पार्टियों के कितने कार्यकर्ता अस्पतालों से लेकर श्मशान घाट पर लोगों की मदद के लिए होते थे। कितने कार्यकर्ताओं ने कोरोना पॉजिटिव होकर लाशों में तब्दील हो गए लोगों को कंधा दिया। कितने विपक्षी कार्यकर्ता अपने हाथ में लकड़ियां उठाये श्मशान घाटों के प्लेटफार्मों पर रखे गये शवों को जलाने में मदद के लिये आगे बढ़े। बूढ़ी माओं और जवान हो रहीं लड़कियों की मदद के लिए क्यों नही सपा, बसपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता आगे आये और कहा कि नहीं, जाइये आप घर पर बूढ़े बाप को देखिये, ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए आपकी जगह पर हम लाइन में लगे हैं। जैसे ही नंबर आने वाला होगा हम आपको फोन कर देंगे। वरना पता बताइये हम आपके घर सिलेंडर भिजवा देंगे। कुछ लोगों ने ज़रूर ऐसा किया होगा लेकिन क्या अपेक्षित संख्या में समाजवादी पार्टी का हर कार्यकर्ता ऐसा करते देखा गया।क्या बसपा के हर कार्यकर्ता की ओर से ऐसा किया गया और क्या कांग्रेस का हर कार्यकर्ता लोगों की मदद करने में जूझ गया।

ऐसे में याद आती है जुझारू नेता मुलायम सिंह यादव की। क्या नेताजी पूरी तरह स्वस्थ होते तो गांव-गांव जाकर लोगों को अपने पक्ष में न कर रहे होते। अपने जुझारूपन के लिए विख्यात नेताजी इस डेढ़ साल के महामारी काल में शायद पूरा तो नहीं लेकिन प्रदेश का अधिकांश हिस्सा तो मथ ही डालते। अब उनकी पार्टी के कितने लोगों ने ऐसा किया है। अखिलेश यादव के लिए कितना सुनहरा मौका था अप्रैल और मई में जब पूरे प्रदेश में हाहाकार मचा हुआ था और लोगों के बीच मरहम लगाने वाला कोई नहीं था। ऐसे में कोरोना प्रोटोकाल के नियमों का पालन करते हुए अखिलेश यादव को फील्ड में निकलना था, निष्क्रिय पड़ी सपा इकाइयों को पुनर्जीवित करके कार्यकर्ताओं में जोश भरना था लेकिन क्या यह किया गया। यह सवाल क्या समाजवादी पार्टी से नहीं पूछा जाना चाहिए। यह कहकर भी बचा जा सकता है कि धारा 144 लगी थी लेकिन जिनको काम करना होता है वह कर ही डालते हैं।

बसपा प्रमुख का तो कहना ही क्या? बसपा प्रमुख को विपक्ष में रहते कभी जन सरोकारों के मुद्दों को लेकर सड़क पर आते देखा नहीं गया। यह ताकत तो कांशीराम में थी जो उनके जाने के बाद विलुप्त सी हो गयी। बसपा की हालत तो यह हो गयी है कि आज उसके पास इतने भी विधायक नहीं है कि वह मायावती को पार्टी के दम पर राज्यसभा या विधान परिषद में भी भेज सकें। और अब बात कांग्रेस की जो उत्तर प्रदेश में लगभग आखिरी पायदान पर खड़ी है। प्रियंका गांधी यूपी की प्रभारी हैं लेकिन जब महामारी अपने चरम पर थी तो क्या किसी को वह फील्ड में दिखीं। हां इतना जरुर होता है कि उनके द्वारा नियुक्त प्रोफेशनल्स ट्विटर पर जरुर सक्रिय रहते हैं। हां प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू सक्रिय दिखते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि लोगों के दिलों में जब असहनीय दर्द था और सरकार की उदासीनता, गैर जिम्मेदाराना रवैये के खिलाफ असंतोष था। उनके मन में एक ऐसी पीड़ा थी जिसे बांटकर विपक्ष उन्हें अपने खेमे में कर सकता था। यानी कुल मिलकर लोगों में जो ऐंटी इनकमबेंसी थी, क्या विपक्ष उसको भुना पाया। इससे बेहतर मौका क्या अब विपक्ष को मिल पायेगा। यह विपक्ष को सोचना होगा और विपक्षी कार्यकर्ताओं को फील्ड में निकलने से एक-एक दिन की देर करना विपक्ष के लिए कहीं घातक न साबित हो। बड़ा बनने के लिए कुछ करके दिखाना होता है। फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं।

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