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यूपी के लिए पहेली बने अरविंद शर्मा

Shikha Awasthi 06-06-2021 19:07:09 10 Total visiter


भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष के आज यानी रविवार को लखनऊ में भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों और उसके बाद राज्यपाल आनंदी बेन पटेल से मिलने के बाद अरविंद शर्मा को लेकर अटकलें और तेज हो गयी हैं।

अरविंद शर्मा। एक ऐसा नाम जो उसी दिन से चर्चा में आ गया था जब वह प्रधानमंत्री कार्यालय में इस्तीफा देकर उत्तर प्रदेश में एम एल सी बने थे। उनके निर्वाचन की घोषणा होते ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह, दोनों डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा तथा कुछ और पदाधिकारी उनके साथ जीत का जश्न मनाते दिखे। तभी से यह नाम यूपी की सत्ता के गलियारों में आया और उन्हें मंत्री बनाने से लेकर उप मुख्यमंत्री बनाने की चर्चाएं जोर पकड़ने लगीं।

अब आइये भविष्य पर कयास लगाने से पहले थोडा सा उनका अतीत जान लेते हैं। अरविंद शर्मा यूपी के पूर्वांचल के जिले मऊ के मूल निवासी हैं। वह गुजरात कैडर के आईएएस थे और जब गुजरात में नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया गया तो वह उनके नजदीकी लोगों में शुमार होने लगे। अरविंद शर्मा के बारे में कहा जाता है कि वह काम में तो कर्मठ हैं ही वह विनम्र बहुत हैं और जब तक दी गयी जिम्मेदारी का परिणाम नेतृत्व को नहीं दिखा देते हैं तब तक वह काम में दिन-रात जुटे रहते हैं शायद यही कारण रहा होगा कि गुजरात में आयी देवीय आपदा और अन्य कठिन मौकों पर अपने काम से दम पर वह तत्कालीन मुख्यमंत्री के नजदीक आये और जब बाद में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो अरविंद शर्मा का कद और बढ़ गया।

यहां तक कि उत्तर प्रदेश में जब कोरोना अपने चरम पर था तो प्रधानमंत्री ने अरविंद शर्मा को खास तौर पर अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में कोरोना प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। दरअसल उत्तर प्रदेश की नौकरशाही आपदा में अवसर तलाशने में काफी माहिर मानी जाती है और तभी से यह चर्चा होने लगी कि कई डीएम और वरिष्ठ अधिकारी अरविंद शर्मा के टच में हैं। इसके पीछे एक ही उद्देश्य था अरविंद शर्मा के पावर में आते ही मनचाही पोस्टिंग पाना।

अरविंद शर्मा की यूपी में आमद के साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली व उनके आचार-व्यवहार से असंतुष्ट नेताओं को जैसे आक्सीजन मिल गयी। कहा जाता है कि तमाम नेता अरविंद शर्मा को अपने गिले-शिकवे इसलिए बताने लगे कि शर्मा जी इन्हें दिल्ली दरबार तक पहुंचा देंगे और उसके बाद से ही उनके उपमुख्यमंत्री बनने के कयास लगने शुरू हो गये। यहां तक कि तमाम न्यूज़ चैनल में इस पर लम्बी-लम्बी बहस शुरू हो गयी जो आज भी जारी है

अब बात करते हैं यूपी मंत्रिमंडल की। कमल रानी वरुण और चेतन चौहान के निधन से दो कैबिनेट तथा विजय कश्यप के निधन से राज्यमंत्री का एक पद रिक्त चल रहा है। अगर शर्मा को पावरफुल कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है तो फिर सवाल यह उठेगा कि क्या पूर्वांचल को और सशक्त बनाया जा रहा है। ऐसे में फिर पश्चिमांचल और बुंदेलखंड को लेकर असंतुलन और बढ़ जाएगा। एक सवाल यह भी उठता है कि क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पास रखे गए महत्वपूर्ण विभागों में से कोई विभाग शर्मा को देंगे। क्या केशव मौर्य का भारी भरकम अभियांत्रिकी विभाग देकर केशव मौर्य को नाराज करने की हिम्मत होगी या फिर डॉ. दिनेश शर्मा का विभाग मिलेगा। क्या यूपी की वित्तीय व्यवस्था और सुदृढ़ करने के लिए वित्त मंत्री सुरेश खन्ना का विभाग दिया जाएगा। यह सब इतना आसान नहीं होगा। एक बात यह भी ध्यान में रखनी होगी कि सत्ता का संतुलन कहीं और असंतुलित न हो जाए क्योंकि सूबे में भूमिहार समाज से सूर्य प्रताप शाही कैबिनेट मंत्री है और पिछला लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद मनोज सिन्हा को जम्मू कश्मीर का लेफ्टिनेंट गवर्नर बनाया गया है।

अब ऐसे में सबकी निगाहें एक ही ओर टिकती हैं कि दिल्ली दरबार क्या कहता है। अगर वहां से कोई आदेश मिलता है तो हर हालत में उसका ही पालन होगा और सारी स्थितियां दरकिनार कर दी जायेंगी। अगर आदेश नहीं भी मिलता है केवल यह मैसेज चला जाता है कि अरविंद शर्मा की दिल्ली दरबार कितनी सुनता है और उस पर कार्रवाई किस हद तक होती है तो मंत्रिमंडल में फिर विभाग गौण हो जाएगा। भाजपा के नेता, कार्यकर्ता और नौकरशाही उसी के आधार पर अपनी मानसिकता बना लेंगे और अरविंद शर्मा के चारों ओर इनकी लम्बी चौड़ी फ़ौज चलने लगेगी।

आपको इससे हटकर एक और बात बता दें कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में पीएल पुनिया ही एकमात्र ऐसे नौकरशाह रहे हैं जो बाराबंकी का एक चुनाव जीते और लोकसभा से राज्यसभा तक का सफर तय करते हुए एससी, एसटी आयोग के चेयरमैन बन गए। बाकी नौकरशाह राजनीति में सफल नहीं हो सके हैं। हमारी शुभकामनाएं अरविंद शर्मा के साथ हैं क्योंकि कोई उत्तर प्रदेश के लिए काम करेगा तो विकास तो यूपी ही करेगा और यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि विकास से समृद्धि आती है और समृद्धि से खुशहाली। लेकिन लाख टके की बात तो यह है कि अभी तो बंद मुट्ठी हमारे सामने है। देखते हैं, मुट्ठी खुलती है तो क्या मिलता है?

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