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गौरैया बिना घर का आंगन सूना, खत्म होता जा रहा अस्तित्व

Shikha Awasthi 22-03-2021 13:26:46 19 Total visiter


ज्ञानेन्द्र रावत (एजेंसी)। आज बदलते हुए इस आधुनिक समाज से पक्षी गौरेया का अस्तित्व खत्म होता जा रहा है। मानवीय जीवन से प्रेरित पक्षी गौरैया अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। वहीं बदलती हुई जीवनशैली ने इसकी विलुप्ति में अहम भूमिका निभाई है। दरअसल, पहला कारण तो हमारे घरों की बनावट ही है। देखा जाये तो पहले हमारे घरों की बनावट ही ऐसी होती थी, जिसमें चिडिय़ों के लिए एक खास जगह बनायी जाती थी, झरोखे होते थे, जिनसे होकर चिडिय़ा घर में आती थी और घर में बने आलों में अपना घोंसला बनाती थी।

आज घरों की बनावट ही ऐसी है, जिसमें घोंसले बनाने की बात तो सपना है, चिडिय़ों के आने की गुंजाइश ही नहीं रही है। दरअसल गौरैया धूल से नहाती भी है, जिसे 'सैंड बाथ कहते हैं। आज हालत यह है कि अब घोंसलों में गौरैया नहीं, बल्कि और चिडिय़ां अपना बसेरा बना रही हैं। जहां तक उसके भोजन का सवाल है, शहरों में मिट्टी की ऊपरी सतह, जिसमें नरम शरीर वाले कीड़े रहते हैं, मलबे, कंक्रीट और डामर से ढकी होने के कारण उसे नहीं मिल पाते। पहले परचून की दुकानों में रखी बोरियों पर गौरैया आकर बैठती थी। अनाज के दाने चुगती थी। अब मॉल कल्चर के आने से सब कुछ पैक हो गया है। इसने उसके आने, रुकने की जगह और खाने का सामान भी छीन लिया।
दरअसल हमने ऐसी जीवनशैली विकसित की, जिसने चिडिय़ों के आने के सारे रास्ते ही बंद कर दिये। यही कारण है कि गौरैया हमसे दूर हो गई है और उसकी तादाद दिनोंदिन कम होती जा रही है।

आज से पांच दशक पहले सुबह का पता हमें सूरज के निकलने से नहीं बल्कि गौरैया की चहचहाहट से चलता था। आज ऐसा लगता है कि उसके बिना घर का आंगन सूना है। असलियत में भारत, यूरोप, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और कई अमेरिकी देशों में पायी जाने वाली गौरैया अब महानगरों में ही नहीं, कस्बों और गांवों से भी लुप्त हो चुकी है। अब तो गांवों में भी सीमेंट कल्चर दिनोंदिन बढ़ रहा है।
दरअसल हमारी घरेलू गौरैया यूरेशिया में पेड़ों पर पायी जाने वाली गौरैया से काफी मिलती-जुलती है। देखा जाये तो केवल छोटे कीड़े और बीजों के ऊपर निर्भर तकरीबन 4.5 से 7 इंच के बीच लम्बी और 13.4 से 42 ग्राम के करीब वजन वाली घरेलू गौरैया कार्डेटा संघ और पक्षी वर्ग की चिडिय़ा है। इसका रंग भूरा-ग्रे, पूंछ छोटी और चोंच मजबूत होती है। इसके सिर के ऊपर और नीचे का रंग भूरा, गले, चौंच और आंखों के पास काला रंग होता है। जहां तक इसकी तादाद का सवाल है तो विडम्बना ही है कि गौरैया से सम्बंधित सरकार के पास कोई जानकारी नहीं है।

सच यह है कि अक्सर घर-परिवारों के आसपास रहना पसंद करने वाली गौरैया के लिए आज बढ़ते शहरीकरण और मनुष्य की बदलती जीवनशैली में कोई जगह नहीं रह गई है। आज व्यक्ति के पास इतना समय ही नहीं है कि वह अपनी छतों पर कुछ जगह ऐसी खुली छोड़े जहां वे अपने घोंसले बना सकें। हम इतना ही करें कि नालियों, डस्टबिन व सिंक में बचे हुए अन्न के दानों को बहने देने से बचायें और उनको छत पर खुली जगह पर डाल दें ताकि उनसे गौरैया अपनी भूख मिटा सके।
आज सरकार में ऐसा कोई नेता नहीं है जो पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील हो और उनके बारे में कुछ जानकारियां रखता हो, उन्हें पहचानता हो। इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जितनी प्रशंसा की जाये, वह कम है। एक बार भरतपुर प्रवास के दौरान उन्होंने केवलादेव पक्षी विहार में तकरीबन 80 चिडिय़ों को उनके नाम से पहचान कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था।

देखा जाये तो गौरैया को बचाने के बारे में आज तक किए गए सभी प्रयास नाकाम साबित हुए हैं। इसलिए जरूरी है कि हम अपने घरों की खिड़की और बालकनी में एक मिट्टी के बर्तन में थोड़ा पानी रखें और एक प्लेट में कुछ दाना रखें। घरों के बाहर बाजार में मिलने वाले घोंसले लटकाएं, उसमें वह आकर अपना घर बनाएगी। उसमें थोड़ा पानी व दाना भी रखें। मेहंदी जैसे पेड़ों को लगायें जहां वह घोंसला भी बनायेगी। उन पर पनपने वाले कीड़ों को गौरैया बड़े चाव से खाती है। सरकारें कुछ करें या ना करें, अपने स्तर से तो हम यह कर ही सकते हैं। गौरैया आने वाले समय में किताबों में ही रह जायेगी, इसमें दो राय नहीं।

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