तालिबानी शासन में महिलाओं के अधिकार खतरे में

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काबुल। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद देश की हालात खराब होती जा रही है। हालातों को बिगड़ता देख लोगों के पास देश छोड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। यहीं नहीं तालिबान महिलाओं और बच्चों पर भी कोई रहम नहीं दिखा रहा है। सोशल मीडिया पर ऐसी कई तस्वीरें सामने आ रही हैं जिसमें मां अपने बच्चों को सेना के जवानों को सौंपती नजर आ रही हैं, ताकि उनके बच्चे सुरक्षित रह सकें।

तुर्की सैनिकों ने पेश की मिशल 

एक वीडियो में दिखाया गया कि महिलाओं की मदद के लिए तुर्की के सैनिकों ने हाथ आगे बढ़ाया है । उन्होंने पूरी दुनिया के सामने मिसाल पेश की है। वीडियो में तुर्की के सैनिकों को काबुल हवाई अड्डे पर अपनी मां से बिछड़ गए 2 महीने के मासूम बच्चे का ख्याल रखते हुए देखा जा सकता है। दरअसल, काबुल हवाई अड्डे पर मची भगदड़ के कारण एक महिला अपने 2 महीने के बच्चे और अपने पति से अलग हो गई। ऐसे में तुर्की सेना ने अकेले पिता की भरपूर मदद की। बच्चे के पिता सैन्य लाइन के भीतर उत्तरी द्वार पर खड़े निराश थे और अपने बच्चे को शांत कराने की कोशिश कर रहे थे। जब सैनिकों ने पिता और बच्चे को देखा तो उनकी मदद की और उन्हें सेफ जोन में ले आए। शिशु के शरीर की सफाई की और उसे खाना खिलाया। उसे शांत कराकर बाद में पिता को सौंप दिया।

तालिबानी शासन में सबसे ज्यादा खतरें में हैं महिलाऐं

अफगानिस्तान में तालिबान का डर बच्चों से लेकर बूढ़ों तक है, हालांकि इसमें सबसे ज्यादा खतरा वहां की लड़कियों और महिलाओं के लिए बताया जा रहा है।तालिबानी शासन किस तरह से महिलाओं पर जुल्म कर रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। तालिबान की नजर में महिलाओं के लिए कोई मानवाधिकार नहीं है और इसके कारण महिलाओं का हक सबसे ज्यादा खतरे में है। ऐसे में याद आता है वह चेहरा जो अफगानी महिलाओं की आवाज को हमेशा बुलंद करती रही हैं- अफगान महिला नेटवर्क की संस्थापक महबूबा सिराज। यह वही नाम है जिसने यहां की औरतों को हक के साथ स्वतंत्र रहना सिखाया।

खौफ में हैं अफगानी महिलाऐं 

तालिबान लड़ाकों की बढ़ती ताकत के बाद अफगानी महिलाएं खौफ में जी रही है। इस तरह के खौफ को लेकर महबूबा सिराज काफी चिंतित हैं। उनका कहना है कि, जिस तरह से मौजूदा हालात अफगानिस्तान में हैं, उसे देख कर डर लगता है। काफी जद्दोजहद के बाद महिलाओं को जो हक मिल पाया था वह अब फिर से छिनता नजर आ रहा है। देश सदियों पीछे जा रहा है, और कोई भी मदद को आगे नहीं आ रहा है। तालिबानी भले ही महिलाओं की सुरक्षा को लेकर वादें कर रहे हैं, पर इन पर कौन भरोसा करें? भविष्य को सोच कर रूह कांप जाती है।

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली और अफगानिस्तान में चुनाव आयोग की पूर्व सदस्य ज़ारमीना काकर का कहना है कि , ”इन दिनों मुझसे कोई पूछता है कि मैं कैसी हूँ? इस सवाल पर मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं और मैं कहती हूँ ठीक हूँ। लेकिन असल में हम ठीक नहीं हैं। हम ऐसे दुखी पंछियों की तरह हो गए हैं, जिनकी आँखों के सामने धुंध छाई हुई है और हमारे घरौंदों को उजाड़ दिया गया है। हम कुछ नहीं कर सकते, केवल देख सकते हैं और चीख सकते हैं।

बुरे सपने के सच होने जैसा तालिबानी शासन

20 साल बाद अफगानिस्तान में एक बार फिर तालिबान का शासन लौट आया है। चरमपंथी विद्रोही समूह से महिलाएं हमेशा से डरती रही हैं। अब जब तालिबान ने देश पर अपना कब्जा जमा लिया है तो महिलाओं को डर है कि ये उनके सबसे बुरे सपने के सच होने जैसा होगा। 2001 से पहले जब अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन था, उस समय महिलाओं के लिए कानून काफी दमनकारी थे। महिलाओं को न पढ़ने की इजाजत थी, न बाहर काम करने की। घर से बाहर निकलने के लिए भी महिलाओं को किसी एक पुरुष रिश्तेदार को साथ लेकर जाना जरूरी होता था।

तालिबान के शासन के लौटने के साथ ही महिलाओं की सारी उम्मीदें टूट गई हैं। कई लोगों को डर है कि पिछले 2 दशकों में पत्रकारों और एनजीओ के लिए काम करने वाली महिलाओं ने जो कुछ हासिल किया है, वह सब व्यर्थ जाएगा और तालिबान उनके काम पर प्रतिबंध लगा देगा। अफ़गानों की एक पूरी पीढ़ी एक आधुनिक, लोकतांत्रिक राज्य के निर्माण की उम्मीद में पली-बढ़ी थी लेकिन तालिबान के कब्जे के साथ ही ये सारी उम्मीदें चूर-चूर हो गई हैं।